कोलाहल के शहर में कैसा है कोहराम
क्षण भर को हटता नहीं, चौराहे का जाम
चौराहे का जाम, लगे सबको रौंदेगा
इन काली सड़कों पर, कौन किसे देखेगा
कहे "यशो" वक्तव्य गाँव की सोंधी कल-कल
वह मृगछौनी छोड़ जिए शहरी कोलाहल।
राष्ट्रमण्डल खेल का देश बना मेजवान
सुनके मन हर्षा गया, बढ़े देश की शान
बढ़े देश की शान, शान पर आन मिटेंगे
जनता को क्या पता कि नेता बैंक भरेंगे
कहे यशो वक्तव्य बाँट कर भरा कमण्डल
हमको प्रश्न अनेक दे गया राष्ट्रमण्डल।
ढाई आखर प्रेम का बिकता है बाजार
लोक काम के दाम से करते हैं व्यापार
करत हैं व्यापार बनाया खेल तमाशा
कहीं बन गया जाम, कहीं पर बना समौसा
कहे "यशो" वक्तव्य हवा पश्चिम की आकर
मुन्नी झण्डू बाम बनी, भूली ढाई आखर
भाव जगत का सार है शब्द रूप का मूल
भाव बिना कब रह सका, मन हिय के अनुकूल
मन हिय के अनुकूल, भाव ही प्रेम घृणा है
भाव बिना ये जीवन केवल मृगतृष्णा है
कहे "यशो" वक्तव्य हुआ है जब से प्रेम अभाव
तब से धुँधले हो गये, सच्चे मन के भाव।
लेखन कला अनन्त है मन का सत्य प्रकाश
चली अनवरत लेखनी, छू लेती आकाश
छू लेती आकाश, हृदय भी पावन करती
वह मन का उद्गार, सभी के सम्मुख रखती
कहे "यशो" वक्तव्य करें, नित परहित चिन्तन
सत्य की परिधि साधि, करें कविता का लेखन।